बाल महोत्सव: बच्चों का उत्सव या व्यवस्था का तमाशा?

 

बाल महोत्सव: बच्चों का उत्सव या व्यवस्था का तमाशा?

मंच की चमक के पीछे छिपा बचपन का सच

महाराष्ट्र में ‘बाल महोत्सव’ को बच्चों के सर्वांगीण विकास, प्रतिभा प्रदर्शन और सामाजिक समावेशन का उत्सव बताया जाता है। रंगीन मंच, तालियों की गूंज, वीआईपी मेहमान और चमचमाती ट्रॉफियां—सब कुछ किसी आदर्श आयोजन जैसा दिखता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस चमक के पीछे बच्चों की आवाज़ भी सुनाई देती है?
या फिर यह पूरा आयोजन केवल सरकारी फाइलों में “सफल इवेंट” दर्ज कराने की एक औपचारिक रस्म बनकर रह गया है?


नियोजन: प्रशासन केंद्र में, बच्चा हाशिए पर

किसी भी बाल-केंद्रित आयोजन की आत्मा उसका नियोजन होता है। लेकिन महाराष्ट्र का बाल महोत्सव आज भी एडमिनिस्ट्रेटिव-सेंट्रिक ढांचे पर टिका है।
तारीखें, स्थान, बजट और कार्यक्रम—सब कुछ ऊपर से तय होता है। बच्चों की मानसिक तैयारी, उनकी रुचि, उनकी भावनात्मक क्षमता—इन सवालों के लिए नियोजन में कोई जगह नहीं दिखती।

अक्सर ये महोत्सव वित्तीय वर्ष के अंत या किसी तय सरकारी कैलेंडर के दबाव में जल्दबाजी में आयोजित किए जाते हैं। उद्देश्य स्पष्ट होता है—कार्यक्रम हो जाए, फोटो खिंच जाएं और रिपोर्ट समय पर जमा हो जाए।
लेकिन क्या बचपन को भी “डेडलाइन” में नापा जा सकता है?

बाल सहभागिता: मंच पर मौजूद, निर्णय से अनुपस्थित

बाल सहभागिता का अर्थ केवल नाच-गाने या खेल प्रतियोगिताओं में बच्चों की मौजूदगी नहीं है। वास्तविक सहभागिता तब होती है जब बच्चा यह तय कर सके कि—

  • वह क्या प्रस्तुत करना चाहता है

  • वह किस तरह का खेल या कला चुनना चाहता है

  • उसे किस तरह का वातावरण सुरक्षित और सहज लगता है

वर्तमान बाल महोत्सव में सहभागिता केवल प्रदर्शन तक सीमित है। निर्णय प्रक्रिया में बच्चों की भूमिका लगभग शून्य है।
यहां बच्चा सहभागी नहीं, बल्कि एक “प्रदर्शनी की वस्तु” बन जाता है—जिसे मंच पर खड़ा किया जाता है, तालियां दिलाई जाती हैं और फिर वापस संस्था भेज दिया जाता है।

VIP संस्कृति और प्रोटोकॉल का बोझ

बाल महोत्सव अक्सर बच्चों से ज्यादा अधिकारियों और अतिथियों के इर्द-गिर्द घूमता है।
घंटों तक बच्चों को धूप में खड़ा रखना, लंबे भाषण सुनवाना और प्रोटोकॉल का पालन करवाना—यह सब बाल अधिकारों के मूल भाव के खिलाफ है।

यह बच्चों का समय है, उनकी ऊर्जा है, उनका उत्सव है।
फिर इसे सत्ता प्रदर्शन का मंच क्यों बना दिया जाता है?

रद्दी के समान सर्टिफिकेट और झूठी उपलब्धि

महोत्सव के अंत में मिलने वाले सर्टिफिकेट और ट्रॉफियां बच्चों को जीत का अहसास तो कराती हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि इनका कोई अकादमिक या व्यावसायिक मूल्य नहीं होता।
न कोई बोर्ड मान्यता, न कोई कौशल-क्रेडिट, न भविष्य में कोई उपयोग।

जब बच्चा 18 साल का होकर संस्था से बाहर निकलता है, तब ये उपलब्धियां उसके किसी काम नहीं आतीं।
यह बच्चों को झूठे प्रोत्साहन का एहसास कराकर, भविष्य में और गहरी निराशा की ओर धकेलने जैसा है।

महोत्सव के बाद की अनदेखी: भावनात्मक टूटन

तीन-चार दिनों की दोस्ती, साझा अनुभव और भावनात्मक जुड़ाव—महोत्सव के बाद अचानक टूट जाता है।
बच्चे वापस अपनी संस्थाओं में लौटते हैं, लेकिन उनके मन में तुलना, असंतोष और विद्रोह जन्म ले चुका होता है।

कई बच्चे बेहतर सुविधाओं वाली दूसरी संस्थाओं को देखकर अपनी संस्था से नफरत करने लगते हैं।
पोस्ट-इवेंट काउंसलिंग का कोई ढांचा नहीं होना प्रशासनिक असंवेदनशीलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

क्या होना चाहिए: एक सार्थक दिशा

यदि बाल महोत्सव को सचमुच बच्चों का उत्सव बनाना है, तो—

  • हर CCI में बाल समिति हो, जो चयन और प्रस्तुति तय करे

  • प्रतिस्पर्धा नहीं, सहभागिता और जुड़ाव प्राथमिक उद्देश्य हो

  • कला, लेखन, शिल्प और विचारों की प्रदर्शनी को मंच मिले

  • सर्टिफिकेट्स को कौशल विकास या शिक्षा विभाग से मान्यता मिले

  • महोत्सव के बाद काउंसलिंग और फॉलो-अप अनिवार्य हो

  • बच्चों की गोपनीयता और गरिमा से कोई समझौता न हो

निष्कर्ष: अब सवाल टालना अपराध है

बाल महोत्सव कोई मेला नहीं, बल्कि उन बच्चों के आत्म-सम्मान और भविष्य से जुड़ा अवसर है, जिनके पास परिवार का सहारा नहीं है।
जब तक हम नियोजन की कुर्सी पर बच्चों को नहीं बैठाएंगे, तब तक यह उत्सव केवल एक सालाना तमाशा बना रहेगा।

अब समय आ गया है कि हम
“बच्चों के लिए” नहीं, बल्कि “बच्चों के साथ” काम करें।
वरना ये रंग-बिरंगे मंच, इन मासूमों के जख्मों पर नमक छिड़कने के अलावा और कुछ नहीं होंगे।

लेखक:
श्री. दिनेश मिश्रा
(समाजसेवी | लेखक | मानवाधिकार एवं महिला-बाल संरक्षण पर कार्यरत)


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