दोस्तों नमस्कार,
हम सभी नए उत्साह और पुराने जोश के बीच मे फस कर रह जाते है। तथा अंत मे बहोत भागंभाग होती है या फिर, हाथ खाली रह जाता है।
मुद्दा यह है कि क्या है यह नया उत्साह और पुराना जोश, इसे समझना पड़ेगा। मुझे लगता है कि हमारे भारत मे 96% लोग इस बीमारी से ग्रस्त है। क्या ऐसी कोई बीमारी भी होती है? जी हां! आपको सही लगा यह एक तरह की बीमारी है। जो पूरे देश मे बड़ी ही आसानी से सभी इंसान में पाई जाती है। आपभी अपने आपको इसे पढ़ते - पढ़ते टटोलने की कोशिस करना और खुद को प्रमाणित करना। क्योंकि मेरे जैसे कुछ लोग इस बीमारी से बाहर निकलने का प्रयास कर रहे है। पर क्योंकि यह संसर्गजन्य बीमारी है तो बहोत जल्द पकड़ती है और इसका कोई इलाज डॉक्टर के पास नही है। क्योंकि इसका इलाज अपने आप मे ढूढना पड़ता है। जोकी बहोत आसान भी है, और बहोत मुश्किल भी।
समझने के लिए सबसे पहले सुरुवात कहासे करना है यह बड़ा मुद्दा है, क्योंकि हमारी जिंदगी "मुर्गी ओर अंडे" की तरह हो गई है क्या पहले आया "मुर्गी या अंडा" इसलिए मुझे लगता है कि कोई फरक नही पड़ता कि कहा से सुरु किया जाये।
बचपन से सुरु करते है:-
बच्चा पैदा होते ही परिवार के सभी लोग उत्साह में होते है, बहोत लाड़ प्यार करते है, बच्चों की सभी जरूरते पूरी करने की कोशिस करते है। पर जैसे - जैसे बच्चे बडे होने लगते वैसे - वैसे उत्साह पुराने जोश में बदल जाता है। तथा बच्चों के पास ध्यान कम देने लगते है। बच्चों की बातों को टालने लगते है। बच्चों की जरूरतों को अपने हिसाब से पूरा करने का प्रयास करते है। बच्चों को समझने में पालक असमर्थ महसूस करते है।
स्कूल का पहिला सप्ताह:-
हम सभी को स्कूल का पहिला सप्ताह याद होगाही, जहा सभी को नई किताबें, नोट बुक, बैग बाकी के साहित्य मिलते थे। सभी बड़े उत्साह के साथ तयारी करते थे। नई नई किताबों पर कवर लगाते है, उसपर अच्छे से नाम लिखते है। पर जैसे ही स्कूल सुरु होता है, हमारा उत्साह पुराने जोश में बदल जाता है, फिर पालको को हमारे पीछे पड़ना पड़ता है। भाई एक बार तो किताब निकाल कर देखलो, क्या पढ़ना या लिखना है। पर क्या मजाल है कि परीक्षा के पहले किताब ईमानदारी से अपने हाथ मे आजाये।
बचत की सुरुवात:-
यह तो एक धमाल काम है इतने उत्साह ओर नियोजन के साथ किया जाता है, की पूछो ही मत। हर कोई अपनी क्षमता के अनुसार यह सुरु करता है। पर जैसे ही तीन महीने बीत जाते है लोगोको उनका खर्च याद आने लगता है। कैसे सभी खर्च को पूरा कर पाएंगे इसके बारे में सोचने लगते है। जिस वजह से बचत का उत्साह फिर एक बार पुराने जोश में बदल जाता है। तब लोग कहते है कि क्या करे बचत ही नही होती, इतनी कमाई ही नही है बचत कहा से करे।
प्यार के लिए कुछ भी:-
यह एक मज्जेदार ओर झूटा शब्द है, प्यार के लिए कुछ भी करेंगे। यहां भी सुरूवाती उत्साह और पुराना जोश दिख जाता है। देखिए आपके आसपास ऐसे उदाहरण बहोत होंगे चेक करे।
1. सुरूवाति समय मे एक दूसरे के बगैर जी नही सकते ऐसे दिखाते है, ओर बाद में जितना दूर रहो उतना अच्छा है।
2. बिना बात किये चेन नही आता रातो को खाना हजम नही होता, बाद में जितना शांत रहे उतना अच्छा महसूस होता है।
3. सुरुवात में बहोत चिपक कर बैठते है समाज का डर नही होता, बाद में समाज के डर से दूर बेठते है।
4. आखो में आँखे डालकर बैठने वाले बाद में आँखे चुराते है।
यहां भी है नया उत्साह और पुराना जोश। लोग जिंदगी काटने लगते है, जीते कम ही है।
हमारी सरकारे या नेता गण की बात करे तो।
चुनाव के पहले सभी नए उत्साह में होते है, घर घर जाकर निवेदन करते है। सभी चमचे अपनी बात मनाने में लगे रहते है। हर उम्मीद इन्ही नेता से पूरी होगी कहा जाता है, चुनाव के बाद न तो नेता मिलता है और नही चमचे मिलते है। चुनाव के बाद नया उत्साह पुराने जोश में मिल जाता है। हम भी मिलने नही जाते क्योकि जानते है कुछ काम नही होगा।
सरकारी योजना:-
यहां तो लोगोका एक मजाक बनाकर रखा है। हर योजना नए उत्साह के साथ सुरु होती है और पुराने जोश में तब्दील हो जाती है। उस योजनाओ का लाभ किसको मिला यह अंधेरे में टॉर्च लेकर सुई ढूढने के बराबर रह जाता है वैसे ही सरकारी काम भी है। नए उत्साह में सुरु करते है और लापरवाही के चलते खत्म ही नही कर पाते, कई जगह तो देखभाल की कमी भी दिखाई देती है।
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