“मुझे लगता है,
नोकर और नोकर की मानसिकता वाले इंसान कभी आत्मनिर्भर नहीं हो सकते।”
यह वाक्य केवल एक विचार नहीं, बल्कि हमारे समाज की एक गहरी और कड़वी सच्चाई है। आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक स्थिति से नहीं आती, बल्कि वह सोच, आत्मसम्मान और निर्णय लेने की क्षमता से जन्म लेती है। जो व्यक्ति केवल आदेश मानने का अभ्यस्त हो जाता है, सवाल पूछने से डरता है और अपनी सोच को दबा देता है—वह धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र चेतना खो बैठता है।
नोकर होना कोई अपराध नहीं है। मेहनत से काम करना, ईमानदारी से सेवा देना सम्मानजनक है। लेकिन नोकर-मानसिकता एक मानसिक गुलामी है—जहाँ व्यक्ति अपने अधिकार, संभावनाएँ और सपनों को दूसरों की मर्जी पर छोड़ देता है। ऐसी मानसिकता में इंसान सुरक्षित तो महसूस करता है, पर सशक्त नहीं बन पाता।
हमारा समाज लंबे समय तक ऐसी व्यवस्थाओं से संचालित रहा है जहाँ सवाल पूछना विद्रोह माना गया, और आज्ञापालन को सद्गुण। परिणामस्वरूप पीढ़ियों तक लोगों को यह सिखाया गया कि “जो मिल रहा है, उसी में संतोष करो।” यह संतोष नहीं, बल्कि आत्मसमर्पण है—जो आत्मनिर्भरता की राह रोक देता है।
आत्मनिर्भर व्यक्ति वही होता है जो—
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अपने फैसले खुद ले,
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जोखिम उठाने का साहस रखे,
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असफलता से सीखे,
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और अपने श्रम की कीमत समझे।
नोकर-मानसिकता वाला व्यक्ति अवसर देखता है, पर पकड़ नहीं पाता; अन्याय सहता है, पर विरोध नहीं करता; और परिवर्तन चाहता है, पर पहल नहीं करता। जब तक सोच गुलाम है, तब तक साधन होने पर भी इंसान स्वतंत्र नहीं बन सकता।
आज ज़रूरत है मानसिक आज़ादी की। शिक्षा, जागरूकता, कौशल और आत्मसम्मान ये चार स्तंभ आत्मनिर्भरता की नींव हैं। खासकर महिलाओं, युवाओं और वंचित वर्गों के लिए यह और भी आवश्यक है कि वे “आज्ञापालन” नहीं, बल्कि “आत्मविश्वास” को अपनी पहचान बनाएं।
आत्मनिर्भर भारत का सपना तब ही साकार होगा, जब हम पहले आत्मनिर्भर नागरिक बनाएँगे. जो केवल नौकरी नहीं, दिशा खोजें; केवल आदेश नहीं, उद्देश्य समझें; और केवल जीवित न रहें, बल्कि गरिमा के साथ जीवन जिएँ।
लेखक:
श्री. दिनेश मिश्रा
(समाजसेवी | लेखक | मानवाधिकार एवं महिला सशक्तिकरण पर कार्यरत)

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