एक मीटिंग ने खोल दी व्यवस्था की संवेदनहीनता की परतें!
श्री.
दिनेश मिश्रा
बाल अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए तंत्र में यदि बच्चों की आवाज़ ही अनसुनी कर दी जाए, तो यह चिंता का विषय बन जाता है।
इन्हीं
मुद्दों को लेकर हाल ही में एक बालगृह में हुई मीटिंग ने कई सवाल खड़े कर दिए—
क्या
सचमुच बच्चों की सहभागिता का अधिकार सुरक्षित है?
क्या
व्यवस्था बच्चों को सुनने के लिए तैयार है?
एक साधारण-सी मीटिंग, जिसने बड़ा सच उजागर कर दिया
उनकी
बातें स्पष्ट, वास्तविक और समाधानात्मक थीं।
लड़कियों की प्रमुख बातें थीं:
- CWC द्वारा गलत आश्वासन देकर भेजी जा रही लड़कियाँ, जिन्हें लगता है कि वे अगले ही दिन बाहर चली जाएँगी, इसलिए नियम मानने से इंकार कर देती हैं।
- जिन्हें बालगृह में रहना ही नहीं है, उन्हें भेजा न जाए, क्योंकि वे पूरे घर का माहौल बिगाड़ देती हैं।
- बड़ी उम्र की बच्चियों का व्यवहार देखकर छोटी बच्चियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- नई लड़कियों को नियम और प्रक्रिया की पूरी जानकारी देकर भेजा जाए, ताकि भ्रम और अव्यवस्था न फैले।
ये बातें न केवल उचित थीं बल्कि बाल समिति के उद्देश्य को भी दर्शाती थीं, बच्चों को अपनी बात रखने का अधिकार देना।
बाल समिति की इन बातों को सुनने के बजाय, अधिकारियों ने अप्रत्याशित टिप्पणियाँ कीं:
- “यह तुम्हारा काम नहीं है, इसके लिए कर्मचारी हैं।”
- “तुम्हारी बाल समिति खत्म कर देते हैं।”
- “इन लड़कियों में लीडरशिप के चक्कर में अहंकार आ गया है।”
- “अधीक्षक बताएगा, बच्चों को बोलने की जरूरत नहीं।”
“हमने
कई बार पत्र और कॉल द्वारा जानकारी दी है, कार्रवाई
न होने पर ही बच्चे बात रख रहे हैं।”
तो फिर सवाल उठता है।
क्या
बाल समिति सिर्फ ‘अच्छी बातें’ बताने के लिए है?
जीवन के अधिकार का भी हनन — बच्चों की मानसिक पीड़ा
यह बात यहाँ विशेष रूप से जोड़नी आवश्यक है:
जिन बच्चों को बालगृह में रहने की आवश्यकता नहीं है, उन्हें जबरजस्ती गलती का एहेसास दिलाने या जेल जैसे वातावरण में अनावश्यक रूप से रोककर रखा जाता है।
वे हर पल बाहर निकलने की सोचते हैं।
तनाव,
घुटन,
अनिश्चितता
— यह सब उनके Right to Life with Dignity (गरिमा
के साथ जीवन का अधिकार) का सीधा हनन है।
ऐसे बच्चों के मन में यह जगह घर नहीं, बल्कि कैदखाना बन जाती है।
और यह
स्थिति बच्चों के भविष्य विकास को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
क्या लड़कियों ने “पुरुषीन मानसिकता” को चुनौती दी?
मीटिंग में मौजूद कुछ सदस्यों की प्रतिक्रिया देखकर मुझे व्यक्तिगत रूप से यह स्पष्ट महसूस हुआ:
इन बच्चियों की खुलकर बोलने की क्षमता ने शायद पुरूष-प्रधान मानसिकता (Male Ego / Patriarchal Mindset) को आहत किया।
यह कई
लोगों को असहज कर देता है।
और
उनकी इस असहजता का सीधा रूप था गुस्सा, झुँझलाहट
और अपमानजनक टिप्पणियाँ।
कुछ अधिकारियों का चेहरा बता रहा था।
“एक
बच्ची हमें कैसे टोक सकती है? हमसे
सवाल कैसे कर सकती है?”
यह प्रतिक्रिया नेतृत्व से नहीं, अहंकार से आती है।
क्या व्यवस्था स्वयं बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन कर रही है? आपको क्या लगता है?
सहभागिता का अधिकार
जो
बोलते हैं, उन्हें “एरोगेंट”
कहा जाता है।
परिवार का अधिकार
SIR
तक
बालगृह को नहीं भेजा जाता—यह कानून का स्पष्ट उल्लंघन है।
“थोड़ा
संभाल लो। आपने बालगृह खोला है, जिम्मेदारी
आपकी है।”
असली
मार्गदर्शन, काउंसलिंग,
जीवन
कौशल—इनकी चिंता शायद ही किसी को है।
हर
अधिकारी के बदलते ही नियम भी बदल जाते हैं।
कानून
का पालन नहीं, बल्कि “काम
आसान कैसे हो”—यही प्राथमिकता दिखाई देती है।
“जेव्हा
बुडा खाली आग लगते तेव्हा जागे होतात।”
देश–दुनिया
की Best
Practices सीखें,
और
बच्चों के हित को केंद्र में रखें—
तो
बहुत बड़ा बदलाव संभव है।
लेकिन सवाल यही है—
क्या
यह व्यवस्था जिम्मेदारी लेने को तैयार है?
तो अधिकारी अपनी ऊर्जा कागजी काम में नहीं, बच्चों की सुरक्षा और पुनर्वास में लगा पाएँगे।
यह लेख शिकायत नहीं — संवेदनशील प्रणाली की माँग है
जो
लोग बच्चों के लिए काम करते हैं
उनके
लिए यह मुद्दे सिर्फ “कानूनी”
नहीं,
भावनात्मक
और नैतिक ज़िम्मेदारी के होते हैं।
तो
यही इसकी सार्थकता है।
जिम्मेदार इंसान ही जिम्मेदारी लेता है!
“बच्चों
की आवाज़ को सुनना ही उनका अधिकार है।”
—
श्री. दिनेश मिश्रा
संस्थापक,
Trikay Care & Creation Association
मो.:
9029956626

स्वप्नालय बाल गृहातील 'बाल समिती' आणि एकूणच बाल कल्याण व्यवस्थेतील मुलांशी संबंधित गंभीर समस्या आणि अनुभव मांडले आहेत.
ReplyDeleteमुख्य मुद्दे:
बाल समितीचे महत्त्व: बाल समिती मुलींचा आत्मविश्वास वाढवण्यासाठी, नेतृत्वाची भावना निर्माण करण्यासाठी आणि बाल गृहात मुलींना येणाऱ्या समस्यांवर उपाय शोधण्यासाठी काम करते. ही समिती मुलींना चांगले जीवन जगण्यासाठी मदत करते.
बाल समितीची गरज: समितीमध्ये CWPC (Child Welfare and Protection Committee) आणि DCPC (District Child Protection Committee) सारखे सदस्य असतात, जे मुलांसाठी काम करतात. त्यामुळे मुलांना त्यांची गरज आहे, त्यांनी मुलांचे प्रॉब्लेम्स ऐकून घेतलेच पाहिजेत.
वैयक्तिक अनुभव आणि निरीक्षण: बोलणाऱ्या व्यक्तीने स्वतः 'क्रांती कमिटी'ची सदस्य म्हणून CWPC आणि DCPC सोबत ४ वर्षांपूर्वी मीटिंगमध्ये भाग घेतला होता. त्यावेळचा महत्त्वाचा मुद्दा होता की शॉर्ट टर्मसाठी आलेल्या मुलींना (ज्यांचे स्वतःचे प्रश्न सुटल्यावर घरी परत जातील) आणि काही कारणास्तव घरातून पळून आलेल्या मुलींना, तसेच ज्यांना मानसिक त्रासातून शिक्षण आणि करिअरवर लक्ष केंद्रित करायचे आहे, अशा शाळांमध्ये जाणाऱ्या मुलींसोबत ठेवणे नकारात्मक परिणाम करू शकते.
संस्था आणि नियमांची भूमिका: संस्थेने आणि समुपदेशकांनी (काऊन्सिलर्स) करिअरसाठी मदत करायला हवी. मात्र, काही मुली नकारात्मक वातावरण तयार करतात. त्या अभ्यास न करता राहू शकतात, त्यामुळे चांगल्या मुलींवरही नकारात्मक परिणाम होऊ शकतो.
समितीचे विसर्जन आणि मुलांचा आवाज: बाल समिती रद्द करण्याची मागणी करणे किंवा मुलींनी बोलू नये असे सांगणे अत्यंत वाईट आहे. यामुळे मुलांचा आवाज दाबला जात आहे आणि त्यांना वाटते की संस्था/सरकार/CWPC/DCPC त्यांच्यासाठी काहीच करत नाही. यामुळे मुलांचा कायद्यावरील आणि कामा करणाऱ्या लोकांवरील विश्वास उडू शकतो.
अधिकार्यांचे नकारात्मक वर्तन (Male Ego/Defensive Behaviour): जेव्हा मुलींनी प्रश्न विचारले, तेव्हा CWPC आणि DCPC यांनी स्वतःचा बचाव (defend) करण्याचा प्रयत्न केला आणि त्यांना अपमानकारक (offending) वाटले. अधिकाऱ्यांनी मुलींच्या बाजूने आवाज उठवला नाही किंवा त्यांचे म्हणणे ऐकले नाही. हे पुरुष प्रधानता (male ego) किंवा महिला अधिकाऱ्यांकडूनही मुलींना मदत न मिळणे दर्शवते, जे अत्यंत निराशाजनक आहे.
मागणी: बोलणाऱ्या व्यक्तीला पुन्हा अशा मीटिंगमध्ये सहभागी व्हायचे आहे, जिथे ती हे मुद्दे ठामपणे मांडू शकेल आणि या गंभीर परिस्थितीवर लक्ष वेधेल. स्वप्नालय इतर बाल गृहांपेक्षा चांगले आहे, तरीही सुधारणांसाठी प्रयत्न करणे गरजेचे आहे.
हे विषय अत्यंत गंभीर आणि संवेदनशील आहेत. यावर कारवाई करणे महत्त्वाचे आहे, कारण हे असेच चालू राहिले तर परिस्थिती आणखी बिघडू शकते आणि मुलांचा आत्मविश्वास तसेच प्रशासनावरील विश्वास नष्ट होऊ शकतो.