सरकारी रिपोर्टों के बोझ तले दबता बचपन
कानून हैं, योजनाएँ हैं, आयोग हैं — फिर भी बच्चे असुरक्षित क्यों? एक बेचैन करने वाले सवाल की तलाश।
देश में बच्चों की सुरक्षा के लिए कानून हैं, आयोग हैं, योजनाएँ हैं — कमेटियाँ हैं, बाल कल्याण संस्थाएँ हैं, महिला एवं बाल विकास विभाग है, शिक्षा व्यवस्था है, न्याय व्यवस्था है। तहसील, जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों के लिए काम करने वाली अनगिनत संस्थाएँ खड़ी हैं। हर साल रिपोर्टें छपती हैं, सम्मेलन होते हैं, जागरूकता अभियान चलते हैं — और "बाल सुरक्षा" शब्द भाषणों में बड़े गर्व के साथ बोला जाता है।
इतनी व्यवस्थाएँ होने के बावजूद बच्चे आज भी असुरक्षित, डरे हुए, शोषित और अनदेखे क्यों हैं?
यह सवाल किसी एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना तक सीमित नहीं है। यह हमारी पूरी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था पर सीधे उँगली उठाने वाला सवाल है। क्योंकि आज की हकीकत बेहद बेचैन करने वाली है — बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन पर है, वही व्यवस्थाएँ अक्सर सिर्फ कागज़ों पर काम करती दिखती हैं।
1,77,335 - बच्चों के खिलाफ अपराध के मामले — सिर्फ 2023 में
हर 15 मिनट - एक बच्चे के यौन शोषण का मामला दर्ज होता है
सिर्फ 3% - POCSO मामलों में सज़ा मिल पाती है — 97% आरोपी बच निकलते हैं
स्रोत: NCRB 2023 | India Child Protection Fund 2022
2022 में भारत में 1,62,000 से ज़्यादा बाल शोषण के मामले दर्ज हुए — यानी 2016 के मुकाबले यौन हिंसा में 96% की बढ़ोतरी। और सबसे दर्दनाक सच्चाई यह है कि 53% मामलों में अपराधी कोई अजनबी नहीं — बल्कि माँ-बाप, रिश्तेदार या स्कूल के शिक्षक होते हैं।
2023 के अंत तक 2,62,089 POCSO मामले अदालतों में लंबित पड़े थे। इनमें से 46% मामले दो साल से भी ज़्यादा समय से अटके हैं। न्याय इतना दूर है कि कैलाश सत्यार्थी फाउंडेशन ने खुलासा किया — हर रोज़ चार पीड़ित बच्चों को न्याय नहीं मिलता।
वो घटनाएँ जो झकझोर देती हैं
कोलकाता · अगस्त 2024
आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज — एक डॉक्टर की हत्या और बलात्कार
एक महिला डॉक्टर अस्पताल के भीतर ही बर्बरता की शिकार हो गई। देश भर में आक्रोश फैला, लेकिन जिस तरह सबूत नष्ट किए गए, जिस तरह प्रशासन ने प्रतिक्रिया दी — उसने साबित किया कि सुरक्षित जगहें भी अब सुरक्षित नहीं रहीं। जब एक पढ़ी-लिखी डॉक्टर सुरक्षित नहीं, तो एक बच्ची का क्या होगा?
दिल्ली · 2025
चाइल्ड पोर्नोग्राफी — 1,197 सुराग, सिर्फ 60 FIR
दिल्ली पुलिस की स्पेशल यूनिट SPUWAC को साल 2025 में बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी 1,197 ठोस सूचनाएँ मिलीं। उनमें से महज 60 FIR दर्ज हो पाईं। बाकी 1,100 से ज़्यादा मामले — कहाँ गए? यह आँकड़ा सिर्फ एक शहर का है। पूरे देश का हिसाब कौन रखेगा?
पूरा भारत · 2024
22.5 लाख — ऑनलाइन बाल शोषण सामग्री की शिकायतें
2024 में दक्षिण एशिया में बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) की शिकायतें सबसे ज़्यादा भारत में दर्ज हुईं — अकेले 22.5 लाख। यानी हर मिनट 4 शिकायतें। यह वो बच्चे हैं जिनका बचपन किसी की स्क्रीन पर बिक रहा है — और हम सोशल मीडिया पर "बाल सुरक्षा दिवस" मनाते हैं।
बच्चों पर अत्याचार होने के बाद हम बहस शुरू करते हैं —
"माता-पिता को वक्त देना चाहिए" · "बच्चों से बात करनी चाहिए" · "समाज को जिम्मेदार बनना होगा" · "पालकों के लिए कार्यशालाएँ होनी चाहिए"
ये सब बातें ज़रूरी भी हैं और सही भी। लेकिन क्या इन्हें कहते हुए हम असली सच्चाई से मुँह नहीं फेर रहे?
आज एक आम इंसान की ज़िंदगी भारी आर्थिक असुरक्षा में उलझी हुई है। रोजगार की कोई गारंटी नहीं। महँगाई बढ़ती जा रही है। एक इंसान की कमाई से घर नहीं चलता, इसलिए घर के मर्द और औरत — दोनों को बाहर काम पर जाना पड़ता है। ऐसे में "क्वालिटी टाइम" का ख्याल बहुत से परिवारों के लिए एक अनजानी विलासिता बन गया है।
कोविड के बाद शिक्षा व्यवस्था ने भी गहरे ज़ख्म दिए। कई स्कूल बंद हो गए, कुछ ने शिक्षा के व्यापारीकरण को और तेज़ किया, फीस के नाम पर माँ-बाप की जेबें खाली हुईं। ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर बच्चों के हाथ में चौबीसों घंटे मोबाइल आ गया — और पढ़ाई के लिए दिया गया औज़ार उनके अकेलेपन की वजह बन गया। आज मोबाइल महज़ बातचीत का साधन नहीं रहा; वह बचपन पर कब्ज़ा करने वाली एक समानांतर दुनिया बन चुका है। पर इस पर गंभीर सार्वजनिक बहस कहाँ है?
दूसरी तरफ, जिनके पास पैसा है, सत्ता है, राजनीतिक संरक्षण है — उन्हें कानून का कोई डर नहीं बचा। महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार करने वाले कई आरोपी समाज में खुलेआम घूमते हैं। किसी के गले में राजनीतिक पार्टी का झंडा है, किसी को सत्ता का आशीर्वाद मिला हुआ है। ऐसे में एक आम नागरिक का न्याय व्यवस्था पर भरोसा कैसे टिकेगा?
जब राजनीति में अपराध घुस जाए और व्यवस्था में भ्रष्टाचार बढ़ जाए, तो उसकी सबसे भारी कीमत समाज के कमज़ोर लोग चुकाते हैं — और उनमें सबसे असुरक्षित होते हैं बच्चे।
बच्चों की सुरक्षा का सवाल सिर्फ "पालन-पोषण" का सवाल नहीं है — यह व्यवस्था की नैतिकता का सवाल है।
हम माँ-बाप को दोष देते हैं — खासकर माँ को। बच्चों की परवरिश की हर बहस में माँ को केंद्र में रखा जाता है। लेकिन घर के पुरुष की ज़िम्मेदारी, समाज की भूमिका, सरकार की नाकाम नीतियाँ और व्यवस्था का भ्रष्टाचार — इन पर उतनी ही ताकत से बात कब होती है?
घर में कुछ गड़बड़ हो — तो दोष औरत का · बच्चे पर असर पड़े — तो सलाह माँ को · पर समाज, सरकार और राजनीतिक व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी कब स्वीकार करेगी?
आज बच्चों की सुरक्षा का सवाल सिर्फ नए कानूनों से नहीं सुलझेगा। क्योंकि समस्या केवल अपराधियों की नहीं — समस्या उस माहौल की है जहाँ संवेदनशीलता घटती जा रही है, आर्थिक खाई गहरी होती जा रही है, और सत्ता में बैठे लोगों की नैतिक जिम्मेदारी खत्म होती जा रही है।
जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं जागेगी — जब तक भ्रष्टाचार और अपराध को सत्ता का संरक्षण मिलता रहेगा — जब तक शिक्षा और बाल सुरक्षा बाज़ार के विषय बने रहेंगे — तब तक बच्चों का बचपन रिपोर्टों में सुरक्षित और हकीकत में असुरक्षित ही रहेगा।
आज जरूरत है — सिर्फ नई योजनाओं की नहीं — बल्कि ईमानदार आत्ममंथन की। सवाल पूछने की। व्यवस्था से जवाब माँगने की। और बच्चों को "भविष्य" के रूप में नहीं, बल्कि आज जी रहे एक संवेदनशील इंसान के रूप में देखने की।
क्योंकि किसी समाज की असली तरक्की उसकी इमारतों से, GDP से या नारों से नहीं आँकी जाती — वह इस बात से आँकी जाती है कि उस समाज के बच्चे कितने सुरक्षित, खुश और निडर हैं।
लेखक: श्री दिनेश मिश्रा
आर्थिक सलाहकार | समाजसेवी | लेखक | मानवाधिकार एवं महिला-बाल संरक्षण· dineshmishra.in


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