लोकतंत्र की असली पाठशाला : बच्चों से सीखने की ज़रूरत
“क्रांति कमेटी चुनाव प्रक्रिया” के अंतर्गत आयोजित चुनाव ने लोकतंत्र की उस सच्ची तस्वीर को सामने रखा है, जिसे हम अक्सर केवल पुस्तकों और भाषणों तक सीमित कर देते हैं। 6 से 18 वर्ष की बालिकाओं ने जिस समझदारी, गंभीरता और जिम्मेदारी के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग किया, वह हमारे समाज और राष्ट्र के लिए एक गहरा संदेश है।
इन बालिकाओं ने मतदान को केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं माना, बल्कि उन्होंने यह भली-भाँति समझा कि मत देना भविष्य का चयन करना है। किस उम्मीदवार में कौन-सी योग्यताएँ हैं, कौन सभी के हित में कार्य कर सकता है, और कौन नेतृत्व के योग्य है—इन सभी पहलुओं पर विचार कर उन्होंने अपना निर्णय लिया। पूरे चुनाव के दौरान यह स्पष्ट दिखाई दिया कि मतदान सोच-समझकर, बिना किसी दबाव और पूरी जागरूकता के साथ किया गया।
यह अनुभव हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर ले जाता है—जब इतनी कम उम्र की बालिकाएँ अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को इतनी गंभीरता से समझ सकती हैं, तो फिर हमारे देश के अनेक वयस्क नागरिक मतदान के प्रति उदासीन क्यों रहते हैं? क्यों हम कभी लालच, कभी जाति, कभी धर्म और कभी अफवाहों के आधार पर अपने मत का प्रयोग कर बैठते हैं? क्या लोकतंत्र की मजबूती केवल संविधान से आती है, या जागरूक नागरिकों से?
वास्तव में, लोकतंत्र की जड़ें बचपन में ही मजबूत की जानी चाहिए। जब बच्चों को निर्णय लेने, प्रश्न पूछने और जिम्मेदारी निभाने का अवसर दिया जाता है, तो वे न केवल बेहतर नागरिक बनते हैं, बल्कि समाज को दिशा देने वाले नेतृत्व के रूप में भी उभरते हैं। “क्रांति कमेटी चुनाव प्रक्रिया” इसका जीवंत उदाहरण है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बच्चों को सिखाने के साथ-साथ उनसे सीखने का साहस भी रखें। ये बालिकाएँ हमें याद दिलाती हैं कि लोकतंत्र केवल अधिकार नहीं, बल्कि एक नैतिक कर्तव्य है। यदि हम सचमुच एक सशक्त, जिम्मेदार और जागरूक राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें अपने आचरण में वही ईमानदारी और विवेक लाना होगा, जो इन बालिकाओं ने अपने छोटे-से मतदान केंद्र पर दिखाया।
यह चुनाव केवल एक गतिविधि नहीं, बल्कि एक संदेश है—लोकतंत्र जिंदा है, और उसका भविष्य सुरक्षित हाथों में है।

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