बच्चे पोस्टर नहीं हैं: प्रचार की वस्तु बनते मासूम चेहरे

 

बच्चे पोस्टर नहीं हैं: प्रचार की वस्तु बनते मासूम चेहरे

आज के डिजिटल युग में बच्चों की तस्वीरें सबसे अधिक “सॉफ्ट टूल” बन चुकी हैं।
सरकार हो या सामाजिक संस्था, योजना हो या अभियान—हर जगह बच्चों के मुस्कुराते चेहरे पोस्टरों, बैनरों और सोशल मीडिया पर दिखाई देते हैं।
सवाल यह नहीं है कि कार्य अच्छा है या नहीं, सवाल यह है कि क्या बच्चों का इस तरह उपयोग नैतिक, कानूनी और सुरक्षित है?


बच्चे सबसे कमजोर नागरिक होते हैं

बच्चे न तो अपनी सहमति स्पष्ट रूप से दे सकते हैं,
न यह समझ सकते हैं कि उनकी तस्वीर कहाँ-कहाँ, कितने वर्षों तक और किस उद्देश्य से इस्तेमाल होगी।

फिर भी—

  • उनका चेहरा,

  • उनका नाम,

  • उनकी पहचान,

  • और कभी-कभी उनकी गरीबी या असहाय स्थिति

सब कुछ सार्वजनिक कर दिया जाता है।

यह मदद नहीं, असंतुलित शक्ति का उपयोग है।

सरकार और संस्थाएं: उद्देश्य नेक, तरीका गलत

पोषण, शिक्षा, बाल कल्याण या महिला-बाल विकास जैसे अभियानों में बच्चों की तस्वीरें आम हैं।
लेकिन क्या कभी यह सोचा गया है कि:

  • क्या माता-पिता की लिखित और सूचित सहमति ली गई?

  • क्या बच्चे को यह बताया गया कि उसकी फोटो सार्वजनिक होगी?

  • क्या उसकी पहचान छुपाने के विकल्प पर विचार किया गया?

  • क्या भविष्य में उस बच्चे को किसी प्रकार की सामाजिक या डिजिटल हानि हो सकती है?

अक्सर उत्तर होता है — नहीं

योजना की सफलता दिखाने की जल्दबाजी में
बच्चा “लाभार्थी” से ज़्यादा प्रचार सामग्री बन जाता है।

डिजिटल युग में एक फोटो = स्थायी जोखिम

आज कोई फोटो केवल पोस्टर तक सीमित नहीं रहती।

  • वह सोशल मीडिया पर जाती है,

  • स्क्रीनशॉट होती है,

  • एडिट होती है,

  • और हमेशा के लिए इंटरनेट पर रह जाती है।

कल यही बच्चा बड़ा होकर पूछ सकता है—

“मेरी तस्वीर मेरी अनुमति के बिना क्यों दिखाई गई?”

उस सवाल का जवाब किसी पोस्टर के पास नहीं होगा।

बच्चों की गरिमा बनाम दया-आधारित प्रचार

बहुत सी संस्थाएं अनजाने में बच्चों को
दया, गरीबी और असहायता के प्रतीक के रूप में पेश करती हैं।

यह दृष्टिकोण:

  • बच्चों की गरिमा को ठेस पहुँचाता है

  • उन्हें ‘subject’ नहीं बल्कि ‘object’ बना देता है

  • और समाज में असमानता को और गहरा करता है

बच्चों को “दिखाकर” काम बताना
असल में बच्चों को कमज़ोर करके दिखाना है।

कानून से भी बड़ा सवाल: नैतिक जिम्मेदारी

कानून कहता है—
बच्चों की पहचान सुरक्षित रखो।

लेकिन समाज को इससे एक कदम आगे जाना होगा।
सवाल यह नहीं होना चाहिए कि
“कानून ने क्या मना किया है?”

सवाल यह होना चाहिए—

“अगर यह मेरा बच्चा होता, तो क्या मैं यह स्वीकार करता?”

सही रास्ता क्या है?

सरकार और सामाजिक संस्थाओं के लिए कुछ स्पष्ट कदम अनिवार्य होने चाहिए:

  1. बच्चों के चेहरे बिना आवश्यकता सार्वजनिक न हों

  2. Face blur या symbolic images का उपयोग

  3. लिखित, सूचित और उद्देश्य-आधारित सहमति

  4. हर अभियान में Child Protection SOP

  5. आपत्ति मिलने पर तुरंत सामग्री हटाने की व्यवस्था

बच्चों की सुरक्षा कोई वैकल्पिक विषय नहीं है,
यह केंद्र में रखा जाने वाला सिद्धांत है।

अंतिम बात

बच्चे किसी योजना की सफलता का प्रमाण नहीं हैं।
वे अधिकारों वाले नागरिक हैं।

अगर समाज सच में बच्चों के भविष्य की बात करता है,
तो उसे आज उनके चेहरे नहीं,
उनकी सुरक्षा और गरिमा को सामने रखना होगा।

बच्चे पोस्टर नहीं हैं। वे भविष्य हैं। जिनका वर्तमान बनाना है

लेखक:
श्री. दिनेश मिश्रा
(समाजसेवी | लेखक | मानवाधिकार एवं महिला-बाल संरक्षण पर कार्यरत)

Comments