आज के चोर: जो तिजोरी नहीं, हमारी चेतना लूटते हैं
“आज आजकल चोर-बदमाश हमारे घर में, तिजोरी पर, या जमीन और जायदाद पर डाका नहीं डालते;
ये हमारी भावनाओं पर, हमारी सोच पर, और हमारी मानसिकता पर डाका डालते हैं।
इसलिए सावधान रहें, सतर्क रहें!”
यह वाक्य कोई साहित्यिक अलंकार नहीं है।
यह 21वीं सदी की सबसे सटीक सामाजिक चेतावनी है।
क्योंकि आज का सबसे बड़ा अपराध दिखाई नहीं देता,
आज का सबसे बड़ा डाका एफ़आईआर में दर्ज नहीं होता,
और आज का सबसे खतरनाक चोर हथियार नहीं, विचार लेकर आता है।
1. डाके की परिभाषा बदल चुकी है
एक समय था जब डाका डालने का अर्थ होता था—
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रात का अंधेरा
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नकाबपोश लोग
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हथियारों की धमक
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सोने–चांदी, नक़दी, जमीन के कागज़
लेकिन आज?
आज डाका पड़ता है—
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आपके डर पर
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आपकी आस्था पर
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आपकी पहचान पर
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आपकी सोचने की क्षमता पर
और सबसे खतरनाक बात यह है कि—
इस डाके में पीड़ित को पता ही नहीं चलता कि वह लुट चुका है।
2. आज का चोर कौन है?
आज का चोर कोई एक व्यक्ति नहीं है।
वह एक पूरी व्यवस्था है।
(क) भावनाओं का व्यापारी
जो—
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आपके गुस्से को भड़काता है
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आपके डर को बेचता है
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आपके दुःख को वोट, व्यू, या मुनाफ़े में बदल देता है
टीवी स्टूडियो, सोशल मीडिया ट्रेंड, वायरल वीडियो—
सब इसी व्यापार का हिस्सा हैं।
(ख) सोच को नियंत्रित करने वाला
आज आप क्या सोचेंगे, किससे नफ़रत करेंगे, किससे डरेंगे—
यह तय करने वाले लोग अक्सर आपके आसपास नहीं होते।
एल्गोरिदम तय करता है—
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आपको कौन सी खबर दिखेगी
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कौन सा झूठ बार–बार दिखेगा
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कौन सी सच्चाई दबा दी जाएगी
यह डिजिटल डकैती है।
(ग) पहचान चुराने वाला
आज आपको बताया जाता है—
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आप पहले क्या हैं
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आप किसके खिलाफ हैं
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आपको किससे घृणा करनी चाहिए
आपकी पहचान—
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जाति
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धर्म
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भाषा
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क्षेत्र
इन सबको हथियार बना दिया गया है।
3. भावनाओं पर डाका कैसे डाला जाता है?
भावनाएं सबसे आसान निशाना होती हैं, क्योंकि—
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वे तर्क नहीं मांगतीं
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वे तुरंत प्रतिक्रिया देती हैं
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वे सोचने का समय नहीं देतीं
डर (Fear)
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“देश खतरे में है”
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“संस्कृति खत्म हो रही है”
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“नौकरी छिन जाएगी”
डरा हुआ व्यक्ति सोचता नहीं, केवल मानता है।
गुस्सा (Anger)
गुस्सा सबसे सस्ता ईंधन है।
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उसे फैलाना आसान है
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उसे मोड़ना आसान है
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उसे किसी और दिशा में भेजना आसान है
गुस्से में व्यक्ति—
सही–गलत नहीं देखता, केवल दुश्मन देखता है।
गर्व (False Pride)
झूठा गर्व सिखाया जाता है—
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“हम सबसे महान हैं”
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“हमें किसी से सीखने की जरूरत नहीं”
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“हम पर सवाल करना गद्दारी है”
यह गर्व नहीं, बौद्धिक गुलामी है।
4. सोच पर डाका: सबसे खतरनाक अपराध
जब आपकी सोच लुट जाती है—
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आप सवाल करना छोड़ देते हैं
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आप तर्क से डरने लगते हैं
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आप भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं
आज सबसे बड़ा अपराध है—
लोगों को सोचने से रोक देना।
शिक्षा का अवमूल्यन
शिक्षा अब—
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प्रश्न पूछना नहीं सिखाती
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बल्कि जवाब याद कराती है
सोचने वाला व्यक्ति खतरनाक होता है—
इसलिए उसे हतोत्साहित किया जाता है।
मीडिया की भूमिका
मीडिया अब—
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सूचना नहीं देता
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उत्तेजना बेचता है
बहस नहीं, तमाशा
संवाद नहीं, शोर
5. मानसिकता पर डाका: धीरे–धीरे ज़हर
मानसिकता पर डाका अचानक नहीं पड़ता।
यह—
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रोज़ थोड़ा–थोड़ा होता है
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हंसी, मीम, वीडियो, नारों के ज़रिये होता है
धीरे–धीरे—
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असंवेदनशीलता सामान्य बन जाती है
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नफ़रत जायज़ लगने लगती है
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अन्याय “मैनेजमेंट इश्यू” लगने लगता है
6. क्यों यह डाका दिखाई नहीं देता?
क्योंकि—
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इसमें खून नहीं बहता
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इसमें ताले नहीं टूटते
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इसमें पुलिस नहीं आती
लेकिन इसमें—
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समाज टूटता है
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रिश्ते टूटते हैं
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लोकतंत्र कमजोर होता है
7. संदर्भ: इतिहास, मनोविज्ञान और राजनीति
इतिहास कहता है
हर तानाशाही की शुरुआत—
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हथियार से नहीं
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विचारों पर नियंत्रण से होती है
मनोविज्ञान कहता है
भीड़ में व्यक्ति—
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कम सोचता है
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ज्यादा मानता है
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जल्दी बहकता है
राजनीति कहती है
डरे हुए, बंटे हुए लोग—
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सबसे आज्ञाकारी होते हैं
8. सबसे बड़ा खतरा: सामान्यीकरण
जब आप कहने लगते हैं—
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“सब ऐसे ही हैं”
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“कुछ नहीं बदल सकता”
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“हमें क्या लेना–देना”
तब समझ लीजिए—
डाका सफल हो चुका है।
9. समाधान: सावधान रहना ही प्रतिरोध है
यह लड़ाई—
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सड़क पर नहीं
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सोशल मीडिया पोस्ट से नहीं
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केवल जागरूकता से लड़ी जा सकती है
क्या करें?
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हर सूचना पर सवाल करें
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भावनात्मक उकसावे से दूरी रखें
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पढ़ें—विभिन्न दृष्टिकोण
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असहमति को दुश्मनी न समझें
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बच्चों को सोचने की आज़ादी दें
10. अंतिम चेतावनी
आज अगर आपकी तिजोरी सुरक्षित है,
लेकिन आपकी सोच गिरवी रख दी गई है—
तो आप सुरक्षित नहीं हैं।
आज अगर आपकी ज़मीन आपके नाम है,
लेकिन आपकी राय किसी और की है—
तो आप स्वतंत्र नहीं हैं।
इसलिए—
सावधान रहें।
सतर्क रहें।
क्योंकि आज का डाका
घर में नहीं,
दिमाग में पड़ता है।
लेखक:
श्री. दिनेश मिश्रा
(आर्थिक सल्लागार | समाजसेवी | लेखक | मानवाधिकार एवं महिला-बाल संरक्षण पर कार्यरत)
www.dineshmishra.in

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