दिशाहीन कागजी कार्यवाही: एक प्रशासनिक व्याधि
आज के शासन–प्रशासन में एक अजीब-सी सक्रियता दिखाई देती है। फाइलें चल रही हैं, बैठकों की संख्या बढ़ रही है, आदेश जारी हो रहे हैं और रिपोर्टें समय पर जमा भी हो रही हैं। देखने में सब कुछ “व्यवस्थित” लगता है। लेकिन जब ज़मीन पर झाँककर देखा जाए, तो सच्चाई कुछ और ही बयान करती है। काम हुआ दिखता है, पर बदलाव नहीं दिखता। यही विरोधाभास दिशाहीन कागजी कार्यवाही की सबसे बड़ी पहचान है।
आदेश आते ही अफरा-तफरी
जैसे ही ऊपर से कोई निर्देश आता है, प्रशासनिक तंत्र बिना रुके हरकत में आ जाता है। पर यह हरकत अक्सर सोच-समझ से नहीं, बल्कि घबराहट और जल्दबाज़ी से प्रेरित होती है। आदेश का उद्देश्य क्या है, उसका लाभ किसे मिलेगा, ज़मीनी परिस्थितियाँ क्या हैं—इन सवालों पर चर्चा करने का समय ही नहीं निकाला जाता।
नतीजा यह होता है कि अधिकारी और कर्मचारी एक अराजक सक्रियता में उलझ जाते हैं। समय, ऊर्जा और संसाधन खर्च होते हैं, लेकिन दिशा तय नहीं होती। अंत में जो हासिल होता है, वह है—एक पूरी हुई फाइल और एक संतोषजनक रिपोर्ट।
नियोजन को “समय की बर्बादी” मानने की भूल
इस समस्या की जड़ में है नियोजन (Planning) के प्रति उपेक्षा। प्रशासन में यह मानसिकता बनती जा रही है कि सोचना, योजना बनाना और विकल्पों पर चर्चा करना समय नष्ट करना है। इसलिए सीधे क्रियान्वयन पर ज़ोर दिया जाता है।
जब काम कैलेंडर देखकर, संसाधनों का आकलन करके और ज़मीनी हकीकत समझकर नहीं किया जाता, तब कर्मचारी सोचने वाला इंसान नहीं, बल्कि आदेश मानने वाली मशीन बन जाता है। वह प्रक्रिया निभाता है, पर उद्देश्य से कट जाता है।
प्रक्रिया महत्वपूर्ण, उद्देश्य गौण
धीरे-धीरे प्रशासन का फोकस बदल जाता है। जनकल्याण, सेवा की गुणवत्ता और वास्तविक प्रभाव पीछे छूट जाते हैं। आगे रह जाती हैं—
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फाइल की नोटिंग
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मीटिंग के मिनट्स
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फोटो, सर्टिफिकेट और रिपोर्ट
कार्यक्रम सफल माना जाता है, क्योंकि कागज पूरे हो गए। लेकिन समाज में कोई ठोस बदलाव नहीं आता। योजनाएँ “कागजों में ज़िंदा” और ज़मीन पर मृत हो जाती हैं।
जनता और प्रशासन के बीच बढ़ती दूरी
जब योजनाओं का लाभ जनता तक नहीं पहुँचता, तो सबसे पहले टूटता है विश्वास। लोग प्रशासन को असंवेदनशील और औपचारिक मानने लगते हैं। दूसरी ओर, प्रशासन जनता को “असहयोगी” समझने लगता है। यह दूरी धीरे-धीरे एक खाई में बदल जाती है, जिसे सिर्फ नई योजनाओं से नहीं भरा जा सकता।
समाधान आदेश में नहीं, दृष्टिकोण में है
इस प्रशासनिक व्याधि का इलाज किसी नए सर्कुलर या आदेश में नहीं छिपा है। समाधान है—
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आदेश के मूल उद्देश्य को समझना
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यथार्थवादी समय-सारिणी बनाना
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जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन
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और निरंतर फीडबैक लेना
“करना है” से पहले “क्यों करना है” और “कैसे बेहतर करना है”—यह सोच प्रशासन को दिशाहीन होने से बचा सकती है।
निष्कर्ष
यदि शासन-प्रशासन को वास्तव में परिणामपरक, संवेदनशील और जन-हितैषी बनना है, तो उसे दिशाहीन कागजी कार्यवाही के इस अंतहीन चक्र से बाहर आना ही होगा। अन्यथा फाइलें चलती रहेंगी, रिपोर्टें बनती रहेंगी और विकास—हमेशा की तरह—किसी अगले आदेश की प्रतीक्षा करता रहेगा।
लेखक:
श्री. दिनेश मिश्रा
(समाजसेवी | लेखक | मानवाधिकार एवं महिला-बाल संरक्षण पर कार्यरत)

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