“निर्लज्जम सदैव सुखीम्” — यह संस्कृत सूक्ति सुनने में भले ही व्यंग्य लगे, लेकिन इसके भीतर छुपा अर्थ हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। इसका सीधा मतलब यह नहीं कि निर्लज्ज होना चाहिए, बल्कि यह बताता है कि जिसके भीतर लज्जा, आत्मबोध और संवेदना नहीं होती, वह बाहरी रूप से अधिक ‘सुखी’ दिखाई देता है।
सुख की यह कैसी परिभाषा?
आज के समय में सुख को अक्सर चिंता-मुक्त जीवन के रूप में देखा जाता है।
जो व्यक्ति—
गलत करके भी शर्मिंदा नहीं होता
झूठ बोलकर भी आत्मविश्वास से भरा रहता है
अन्याय देखकर भी चुप रहता है
वह मानसिक रूप से हल्का महसूस करता है। कारण साफ है— उसके भीतर कोई प्रश्न नहीं, कोई अपराधबोध नहीं।
लज्जा क्यों बनती है बोझ?
लज्जा मनुष्य को सोचने पर मजबूर करती है।
वह पूछती है— क्या यह सही है?
यही प्रश्न उसे बेचैन करता है, कभी-कभी दुखी भी करता है।
पर यही बेचैनी उसे एक बेहतर इंसान बनने की दिशा में ले जाती है।
आज की तेज़ रफ्तार दुनिया में लोग इस बेचैनी से बचना चाहते हैं।
इसलिए लज्जा को कमजोरी और निर्लज्जता को चतुराई समझ लिया गया है।
समाज और व्यवस्था में निर्लज्जता
हम अक्सर देखते हैं—
वादे टूटते हैं, पर चेहरे पर मुस्कान रहती है
गलत नीतियाँ बनती हैं, पर जिम्मेदारी कोई नहीं लेता
आम आदमी परेशान होता है, पर निर्णयकर्ता बेफिक्र रहते हैं
यहाँ “निर्लज्जम सदैव सुखीम्” केवल व्यक्ति नहीं, पूरी व्यवस्था पर लागू होता दिखता है।
क्या यही सच्चा सुख है?
यह सबसे ज़रूरी सवाल है।
यदि सुख का मतलब केवल—
आलोचना से बचना
जवाबदेही से दूरी
आत्मसंघर्ष से मुक्ति
है, तो निर्लज्जता सुख दे सकती है।
लेकिन यदि सुख का अर्थ—
आत्मसम्मान
भीतर की शांति
सही और गलत का संतुलन
है, तो यह सुख केवल संवेदनशीलता और नैतिकता से ही संभव है।
निष्कर्ष
“निर्लज्जम सदैव सुखीम्” कोई जीवन-मंत्र नहीं, बल्कि समाज के लिए एक चेतावनी है।
यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि—
क्या हमें सुखी दिखना है,
या भीतर से सही होना है?
क्योंकि इतिहास बताता है—
जो लज्जा महसूस कर सकता है, वही समाज को बदलने की क्षमता रखता है।
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