भारत की शासन यात्रा : मौर्यकाल से लोकतंत्र तक

 

भारत की शासन यात्रा : मौर्यकाल से लोकतंत्र तक

(औपनिवेशिक मानसिकता, लोकतांत्रिक संघर्ष और भविष्य की दिशा)

प्रस्तावना

भारत का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है,
बल्कि यह शासन की सोच (Governance Philosophy) के निरंतर परिवर्तन की यात्रा है।
मौर्य, गुप्त, मराठा और मुगल काल से लेकर अंग्रेजी शासन और आज के लोकतांत्रिक भारत तक—
हर काल ने शासन को देखने और चलाने का अपना दृष्टिकोण दिया।

आज जब हम कहते हैं कि भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है,
तो यह प्रश्न स्वाभाविक है—

क्या हमारी शासन व्यवस्था वास्तव में
भारतीय परंपरा, लोक-कल्याण और नागरिक सहभागिता पर आधारित है?
या हम अब भी औपनिवेशिक मानसिकता के बोझ को ढो रहे हैं?

यह लेख इन्हीं प्रश्नों का समग्र, ऐतिहासिक और समकालीन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।


1. शासन का भारतीय दृष्टिकोण: सत्ता नहीं, सेवा

प्राचीन भारत में शासन को “राजधर्म” कहा गया।
राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि नहीं,
बल्कि प्रजा का सेवक और रक्षक माना गया।

मौर्यकालीन दृष्टि

मौर्य साम्राज्य
का शासन भारतीय प्रशासन का पहला संगठित और अखिल भारतीय प्रयोग था।

  • शासन का उद्देश्य: बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय

  • राजा का कर्तव्य: सुरक्षा, न्याय, समृद्धि

  • अधिकारी: उत्तरदायी, निगरानी में

  • शासन का केंद्र: प्रजा

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में स्पष्ट लिखा है—

“राजा का सुख प्रजा के सुख में निहित है।”

यह कथन भारतीय शासन दर्शन की आत्मा है।

2. मुगल शासन: समन्वय और भारतीयकरण

मुगल साम्राज्य
ने भारत में शासन को केवल तलवार से नहीं,
बल्कि प्रशासनिक समन्वय से टिकाया।

  • मनसबदारी प्रणाली

  • संगठित राजस्व व्यवस्था

  • स्थानीय शासकों से सहयोग

  • अकबर के काल में धार्मिक सहिष्णुता

मुगलों की सफलता का कारण यह था कि
वे भारत में बाहरी शासक बनकर नहीं,
बल्कि धीरे-धीरे भारतीय शासक बन गए।

➡️ जो भारत को अपनाता है, वही भारत में टिकता है—
यह सत्य यहाँ भी सिद्ध हुआ।

3. अंग्रेजी शासन: सत्ता का नहीं, मानसिकता का उपनिवेश

अंग्रेज भारत में शासन करने नहीं,
व्यापार करने आए थे।

लेकिन परिस्थितियों,
भारतीय शासकों की आपसी फूट
और रणनीतिक चालों के कारण
उन्होंने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया।

अंग्रेजों की असली ताकत

  • आधुनिक हथियार नहीं

  • बल्कि प्रशासनिक और मानसिक नियंत्रण

यहाँ निर्णायक भूमिका निभाई
थॉमस बैबिंगटन मैकाले
की शिक्षा नीति ने।

उसका उद्देश्य था—

“ऐसे भारतीय तैयार करना
जो रंग से भारतीय हों
लेकिन सोच से अंग्रेज।”

यहीं से जन्म हुआ
औपनिवेशिक मानसिकता (Colonial Mindset) का।

4. औपनिवेशिक मानसिकता क्या है?

औपनिवेशिक मानसिकता का अर्थ है—

  • शासन को सेवा नहीं, नियंत्रण समझना

  • कानून को इंसान से ऊपर रखना

  • प्रक्रिया को परिणाम से अधिक महत्व देना

  • नागरिक को सहभागी नहीं, याचक मानना

अंग्रेज चले गए,
लेकिन यह मानसिकता—

  • प्रशासन

  • शिक्षा

  • कानून

  • सामाजिक व्यवहार

में गहराई से बैठ गई।

5. स्वतंत्र भारत की शासन व्यवस्था: बदलाव और बोझ

1947 के बाद भारत ने—

  • संविधान अपनाया

  • लोकतंत्र चुना

  • मौलिक अधिकार दिए

लेकिन प्रशासनिक ढाँचा—

  • लगभग वही रहा

  • जो अंग्रेजों ने बनाया था

IAS, पुलिस, राजस्व प्रणाली—
संरचना और सोच में
औपनिवेशिक प्रभाव लिए हुए थीं।

➡️ परिणाम:

  • लोकतंत्र ऊपर से दिखा

  • लेकिन व्यवहार में
    शासन System-Centric बना रहा

6. आज की शासन व्यवस्था: लोकतंत्र बनाम तंत्र

आज भारत में—

  • चुनाव होते हैं

  • सरकारें बदलती हैं

  • संविधान सर्वोच्च है

फिर भी नागरिक अनुभव करता है कि—

  • फाइल ज्यादा महत्वपूर्ण है

  • नियम इंसान से ऊपर है

  • अधिकारी सेवक से अधिक साहब है

यहाँ एक विरोधाभास है—

सिद्धांतव्यवहार
जनता सर्वोच्चप्रक्रिया सर्वोच्च
नागरिक अधिकारप्रशासनिक विवेक
जवाबदेहीदेरी और टालमटोल

7. लोकतंत्र के फायदे और सीमाएँ

लोकतंत्र के फायदे

  • जनता की भागीदारी

  • सत्ता की जवाबदेही

  • अधिकारों की सुरक्षा

  • शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन

लोकतंत्र की सीमाएँ

  • निर्णय में देरी

  • लोकलुभावन राजनीति

  • बहुसंख्यकवाद का खतरा

  • जागरूकता की कमी

लोकतंत्र सबसे तेज़ नहीं,
लेकिन सबसे सुधारशील व्यवस्था है।

8. मौर्य शासन और आज के शासन की आत्मा का अंतर

मौर्यकाल में:

  • शासन लोक-केंद्रित था

  • परिणाम महत्वपूर्ण था

  • नैतिकता शासन की रीढ़ थी

आज:

  • शासन प्रक्रिया-केंद्रित है

  • फाइल और नियम हावी हैं

  • नैतिकता अक्सर औपचारिक है

फर्क सत्ता का नहीं,
शासन की आत्मा का है।

9. औपनिवेशिक मानसिकता आज भी क्यों जीवित है?

मुख्य कारण:

  1. प्रशासनिक सुधारों की धीमी गति

  2. शिक्षा में नागरिक बोध का अभाव

  3. सत्ता का केंद्रीकरण

  4. जवाबदेही की कमजोर व्यवस्था

  5. नागरिकों की सीमित सहभागिता

हम अधिकार मांगते हैं,
लेकिन शासन-निर्माण में
भाग नहीं लेते।

10. परिवर्तन के संकेत: आशा की किरण

यह कहना गलत होगा कि
भारत स्थिर है।

आज:

  • डिजिटल गवर्नेंस

  • RTI

  • DBT

  • पारदर्शिता पहल

  • जनभागीदारी योजनाएँ

ये प्रयास संकेत देते हैं कि—

भारत औपनिवेशिक सोच से
बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है।

11. आगे का रास्ता: भारतीय शासन मॉडल की पुनर्रचना

यदि भारत को वास्तव में
भारतीय शासन मॉडल चाहिए, तो—

  • शासन को सेवा मानना होगा

  • अधिकारी को सेवक बनाना होगा

  • नागरिक को सह-निर्माता बनाना होगा

  • प्रक्रिया से अधिक परिणाम पर ज़ोर

  • स्थानीय स्वशासन को वास्तविक शक्ति

  • शिक्षा में नैतिकता और नागरिक चेतना

निष्कर्ष: स्वतंत्रता का अगला चरण

भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र है,
लेकिन मानसिक रूप से पूर्ण स्वतंत्रता
अब भी एक प्रक्रिया है।

मौर्य काल हमें सिखाता है—
लोक-कल्याण
मुगल काल सिखाता है—
समन्वय
स्वतंत्रता आंदोलन सिखाता है—
सहभागिता

अब समय है—
इन सबको जोड़कर
एक भारतीय, लोकतांत्रिक, लोक-केंद्रित शासन व्यवस्था
गढ़ने का।

सच्ची आज़ादी
सत्ता बदलने से नहीं,
शासन की सोच बदलने से आती है।

लेखक:
श्री. दिनेश मिश्रा
(आर्थिक सल्लागार 
समाजसेवी | लेखक | मानवाधिकार एवं महिला-बाल संरक्षण पर कार्यरत)

 

Comments