शपथों का तमाशा और व्यवस्था का पाखंड
भ्रष्टाचार-मुक्त भारत और बालविवाह-मुक्त भारत—
इन नारों के साथ ली जाने वाली ऑनलाइन शपथें आज एक औपचारिक रस्म बनकर रह गई हैं। सवाल यह नहीं है कि शपथ ली जाती है या नहीं, सवाल यह है कि शपथ लेने वाले अपनी जिम्मेदारी निभाते भी हैं या नहीं।
काग़ज़ पर शपथ, वेबसाइट पर प्रमाणपत्र और सोशल मीडिया पर पोस्ट—
बस यहीं तक सीमित है सरकार की तथाकथित “संवेदनशीलता”।
हकीकत यह है कि—
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वही अधिकारी, जो बालविवाह रोकने की शपथ लेते हैं,
उसी बालविवाह की जानकारी होने के बावजूद आँखें मूँद लेते हैं। -
वही व्यवस्था, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ भाषण देती है,
खुद सबसे बड़ा भ्रष्ट तंत्र बन चुकी है। -
और वही शासन, जो कानून की दुहाई देता है,
कानून तोड़ने वालों को संरक्षण देता है।
अगर शपथ से ही बदलाव आता,
तो आज भारत में न भ्रष्टाचार होता,
न बच्चियों का बचपन छीना जाता।
सच यह है—
ये शपथें गरीब और आम नागरिक को मूर्ख बनाए रखने का एक नाटक हैं।
क्योंकि असली बदलाव—
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मूल्य शिक्षण से आता है,
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डर नहीं, चेतना से आता है,
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और कठोर कार्रवाई से आता है।
लेकिन यह सब करने की इच्छा सत्ता में बैठे लोगों की है ही नहीं।
क्योंकि—
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कहीं उनके रिश्तेदार जुड़े होते हैं,
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कहीं राजनीतिक सौदेबाज़ी होती है,
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और कहीं हिस्सेदारी।
इसलिए—
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सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं, ताकि सोचने वाला नागरिक न बने।
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सरकारी अस्पताल मज़ाक बन चुके हैं, ताकि गरीब मजबूर रहे।
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नौकरियाँ ठेके पर दी जा रही हैं, ताकि युवा असुरक्षित रहे।
और एक असुरक्षित समाज कभी सवाल नहीं करता।
सबसे खतरनाक बात यह है कि—
जनता सब देख रही है,
सब समझ रही है,
फिर भी शांत है।
क्योंकि उसे डराया गया है।
डर में जीना सिखाया गया है।
ज़िंदगी जीने के बजाय, ज़िंदगी काटना सिखाया गया है।
बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था—
“एक दिन जियो, तो शेर की तरह जियो।”
लेकिन आज हाल यह है कि
लोग लाचार की तरह जी रहे हैं,
या कहें—
सिर्फ साँसें गिन रहे हैं।
निष्कर्ष साफ है—
भारत को शपथों की नहीं,
ईमानदार इच्छाशक्ति की ज़रूरत है।
जब तक—
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कानून तोड़ने वालों पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी,
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व्यवस्था के भीतर बैठे अपराधियों को सज़ा नहीं मिलेगी,
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और नागरिक को डर से बाहर नहीं निकाला जाएगा,
तब तक
हर शपथ एक धोखा है,
हर प्रमाणपत्र एक झूठ है,
और हर दावा सिर्फ दिखावा।
यह लेख कड़वा है,
क्योंकि सच हमेशा कड़वा होता है।
लेखक:
श्री. दिनेश मिश्रा
(आर्थिक सल्लागार | समाजसेवी | लेखक | मानवाधिकार एवं महिला-बाल संरक्षण पर कार्यरत)

अप्रतीम विचार.....🤟🏻🫵🏻
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