सुरक्षा के बाद बदलता व्यवहार: एक अनकहा बर्ताव
हमारे यहाँ कई लड़कियाँ आती हैं और कुछ समय बाद चली भी जाती हैं।
एक दिलचस्प—और साथ ही चिंताजनक—पैटर्न बार-बार देखने को मिलता है।
शुरुआती दिनों में वे अत्यंत शांत रहती हैं।
संकोची, चुपचाप रहने वाली, मानो किसी से कोई अपेक्षा ही न हो।
उनके व्यवहार में डर, असुरक्षा और सतर्कता साफ झलकती है।
लेकिन जैसे-जैसे उन्हें यह समझ आने लगता है कि
यहाँ कोई ज़ोर से डाँटता नहीं है,
कोई मारता नहीं है,
कोई अपमानित नहीं करता,
और सबसे महत्वपूर्ण—
यहाँ वे सुरक्षित हैं—
वैसे-वैसे उनका व्यवहार बदलने लगता है।
धीरे-धीरे
पीठ पीछे बातें करना,
कर्मचारियों का अपमान करना,
नियमों को हल्के में लेना—
ये सब सामान्य होने लगता है।
उन्हें वही करना होता है जो उनके मन को अच्छा लगे।
मर्यादा, अनुशासन और सामूहिक ज़िम्मेदारी
उन्हें बंधन जैसी लगने लगती है।
यह बदलाव कई बार कार्यकर्ताओं के लिए बेहद चौंकाने वाला होता है।
क्योंकि बाहर से देखने पर लगता है कि
सुरक्षा मिलने के बाद बच्चा और संतुलित होगा—
पर यहाँ अक्सर उलटा होता है।
दरअसल यह स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं,
बल्कि वर्षों से दबे हुए क्रोध, अविश्वास और असुरक्षा का
अनियंत्रित विस्फोट होता है।
और इसके बाद—
पश्चाताप का एक अंतहीन चक्र शुरू होता है।
गलत व्यवहार के बाद
माफी माँगना,
रोना,
खुद को दोष देना—
और फिर वही व्यवहार दोहराना।
यह चक्र बताता है कि
उन्हें सही-गलत का बोध नहीं है, ऐसा नहीं—
बल्कि भावनात्मक नियंत्रण और आत्मअनुशासन की क्षमता
अब भी विकसित नहीं हो पाई है।
यह समझना ज़रूरी है कि
यह सब किसी की बुराई नहीं,
बल्कि टूटी हुई परवरिश और असुरक्षित बचपन का परिणाम है।
लेकिन साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि
सुरक्षा का अर्थ
असीमित छूट नहीं हो सकता।
संवेदनशीलता के साथ-साथ
स्पष्ट सीमाएँ और जिम्मेदारी
बाल संरक्षण का उतना ही आवश्यक हिस्सा हैं।
लेखक:
श्री. दिनेश मिश्रा
(आर्थिक सल्लागार | समाजसेवी | लेखक | मानवाधिकार एवं महिला-बाल संरक्षण पर कार्यरत)
www.dineshmishra.in

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