परोपकार सुविधा से नहीं, संवेदना से होता है
स्वयंसिद्धा: समाज के आईने में हमारा चेहरा
पिछले कुछ दिनों से मैं स्वयंसिद्धा के बारे में लोगों से मिल रहा हूँ।
कभी आमने-सामने,
कभी सोशल मीडिया के माध्यम से,
तो कभी फोन कॉल पर।
इन मुलाक़ातों और बातचीतों ने मुझे एक ऐसी सच्चाई से रू-बरू कराया, जो कड़वी है, लेकिन जरूरी है।
मैंने पाया कि—
लोग परोपकार करना चाहते हैं,
लेकिन अपनी सुविधा के अनुसार।
सामने वाले की वास्तविक ज़रूरत को ध्यान में रखकर नहीं।
जो कहा गया… जो सुना गया… जो महसूस हुआ
कुछ बातें ऐसी थीं, जो बार-बार सुनने को मिलीं,
1.
“अनाथ लड़कियाँ हैं ना? हमारी लड़कियों के पुराने कपड़े दे दो उन्हें।”
2.
“18 साल हो गए हैं ना? अब नौकरी करने बोलो। कितने दिन लोगों पर आश्रित रहेंगी? आप जैसे लोग इन्हें आलसी बनाते हैं।”
3.
“18 की हो गई हैं तो शादी करा दो। हमारे पहचान में बहुत लड़के हैं, कुछ नहीं करते, कम से कम शादी के बाद जिम्मेदारी आएगी।” (ऐसे फोन मुझे हर हफ्ते आते हैं।)
4.
“कब किसके साथ भाग जाएँगी, पता भी नहीं चलेगा। अब 18 की हैं तो यह उनका फैसला होगा, आप कुछ नहीं कर पाएँगे।”
5.
“किस जाति-धर्म की लड़कियाँ हैं? हम किसे मदद करेंगे, यह तो देखना पड़ेगा।”
6.
“लोगों के पैसे से जीना छोड़ो। अपने दम पर करने को बोलो।”
और कुछ बातें ऐसी भी थीं, जो यहाँ लिखी भी नहीं जा सकतीं शब्द नहीं, तीर थे, जो सीधे कानों और मन पर लगे।
लेकिन… यही पूरी सच्चाई नहीं है
इसी समाज में संवेदनशील लोग भी हैं।
ऐसे लोग,
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जो सवाल नहीं करते, समझते हैं
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जो शर्त नहीं रखते, साथ देते हैं
-
जो जानते हैं कि
ये लड़कियाँ “किसी और की” नहीं,
हमारे ही समाज का हिस्सा हैं।
जो समझते हैं कि,
अगर आज इन पर काम होगा,
तो इनका कल सिर्फ इनका नहीं,
हमारे समाज का बेहतर कल होगा।
जब 100 में से 10 लोग भी ऐसे मिलते हैं, तो दिल से आवाज़ आती है,
हाँ… समाज अभी ज़िंदा है।
स्वयंसिद्धा क्या है? – एक स्पष्ट बात
स्वयंसिद्धा—
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भीख नहीं है
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मुफ्तखोरी नहीं है
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आश्रय पर निर्भरता नहीं है
स्वयंसिद्धा एक संक्रमणकाल (Transition Phase) है।
जहाँ—
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18 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद
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बिना परिवार, बिना सहारे
-
समाज की कठोर वास्तविकता में
अकेली खड़ी लड़की को
संभलने का समय दिया जाता है।
18 साल का मतलब ‘तैयार’ नहीं होता
कानून कहता है—
18 साल = बालिग
लेकिन जीवन कहता है।
18 साल = सबसे नाज़ुक उम्र
जहाँ,
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भावनाएँ अस्थिर होती हैं
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निर्णय जल्दबाज़ी में होते हैं
-
शोषण का खतरा सबसे ज़्यादा होता है
ऐसे में अगर समाज सिर्फ इतना कह दे,
“अब तुम अपने फैसले खुद लो”
तो यह स्वतंत्रता नहीं, असहायता है।
स्वयंसिद्धा क्या करती है?
स्वयंसिद्धा,
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आत्मनिर्भरता सिखाती है, नहीं थोपती
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रोज़गार की तैयारी कराती है, तुरंत कमाने का दबाव नहीं डालती
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विवेक विकसित करती है, जल्दबाज़ी में शादी नहीं कराती
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सुरक्षा और मार्गदर्शन देती है, नियंत्रण नहीं
यहाँ लड़की को सिखाया जाता है,
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पैसा कमाना ही नहीं, संभालना
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नौकरी ही नहीं, आत्मसम्मान
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निर्णय ही नहीं, परिणाम समझना
समस्या लड़कियों में नहीं, हमारी सोच में है
जब हम कहते हैं,
-
“पुराने कपड़े दे दो”
तो हम उनकी ज़रूरत नहीं, अपनी संतुष्टि देखते हैं।
जब कहते हैं,
-
“शादी करा दो”
तो हम समस्या का समाधान नहीं, जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हैं।
जब कहते हैं,
-
“अपने दम पर करो”
तो हम बिना सहारा दिए, धक्का दे देते हैं।
सच्चा परोपकार क्या है?
सच्चा परोपकार,
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सुविधा से नहीं, संवेदना से होता है
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दिखावे से नहीं, जिम्मेदारी से होता है
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एक बार से नहीं, निरंतर साथ से होता है
अंत में… एक सवाल समाज से
अगर,
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आपकी बेटी
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आपकी बहन
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आपकी भतीजी
18 साल की उम्र में बिना परिवार, बिना सुरक्षा इस दुनिया में अकेली होती…
तो क्या आप भी यही कहते?
आशा अभी बाकी है
आज भी,
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कुछ लोग सवाल नहीं, समाधान बनते हैं
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कुछ लोग आलोचक नहीं, सहभागी बनते हैं
-
कुछ लोग समझते हैं कि
समाज का स्तर
सबसे कमजोर व्यक्ति से तय होता है।
स्वयंसिद्धा उन्हीं लोगों की वजह से जीवित है।
और उन्हीं लोगों की वजह से इन लड़कियों का कल, आज से बेहतर होगा।
लेखक:
श्री. दिनेश मिश्रा
(आर्थिक सल्लागार | समाजसेवी | लेखक | मानवाधिकार एवं महिला-बाल संरक्षण पर कार्यरत)
www.dineshmishra.in

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