कर्ज़ और क़ब्र के बीच फँसी ज़िंदगी
— एक सच्चा अनुभव, एक जरूरी चेतावनी
मैं यह लेख किसी किताब के ज्ञान से नहीं लिख रहा हूँ।
मैं यह लेख उन चेहरों को याद करके लिख रहा हूँ,
जो कभी मेरे साथ हँसते थे…
और आज या तो ज़मीन के नीचे सो चुके हैं
या अस्पताल के बिस्तर पर ज़िंदगी से जूझ रहे हैं।
मेरे कुछ दोस्त—
सिर्फ़ कर्ज़ की वजह से इस दुनिया से चले गए।
किसी को हार्ट अटैक आया,
किसी की नींद ही आख़िरी नींद बन गई।
और आज भी 13 दोस्त ऐसे हैं
जो अलग–अलग बीमारियों से जूझ रहे हैं—
बीमारी से ज़्यादा नहीं,
कर्ज़ के डर से।
बीमारी से ज़्यादा जानलेवा है कर्ज़ का तनाव
बीमारी शरीर को तोड़ती है,
लेकिन कर्ज़ मन, आत्मसम्मान और उम्मीद—
तीनों को एक साथ मार देता है।
आज हालत यह है कि
इलाज का खर्च अलग,
पुराना कर्ज अलग,
और भविष्य का डर अलग।
कोई बोलता नहीं,
लेकिन हर कोई अंदर से टूट रहा है।
रातों की नींद उड़ चुकी है।
दिल की धड़कनें दवाइयों पर चल रही हैं।
और चेहरे पर ज़बरदस्ती की मुस्कान है।
कर्ज़ कभी पैसे का नहीं होता, यह मानसिक गुलामी है
हम सोचते हैं—
“थोड़ा कर्ज ले लेते हैं, बाद में चुका देंगे।”
लेकिन सच यह है कि
कर्ज़ आपसे आज़ादी छीन लेता है।
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आप हँस नहीं पाते
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आप बीमार पड़ते हैं
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आप रिश्तों से कटने लगते हैं
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आप खुद को असफल समझने लगते हैं
और धीरे-धीरे…
आप जीते हुए भी मरने लगते हैं।
जिनकी मौत हुई, उनकी गलती क्या थी?
उनकी गलती यह नहीं थी कि वे आलसी थे।
उनकी गलती यह नहीं थी कि वे बेईमान थे।
उनकी एक ही गलती थी—
उन्होंने कर्ज़ को सामान्य मान लिया।
उन्होंने समाज की दौड़ में
अपनी क्षमता से ज़्यादा दौड़ने की कोशिश की।
घर, गाड़ी, शादी, इलाज—
सब कुछ कर्ज़ पर।
और अंत में—
ज़िंदगी भी कर्ज़ में डूब गई।
कर्ज़ मुक्त जीवन: कठिन नहीं, बस ईमानदार चाहिए
सच कहूँ तो—
कर्ज़ मुक्त जीवन कोई तपस्या नहीं है।
यह सिर्फ़ सादगी और समझदारी है।
✔ कम कमाओ, पर सुकून से जियो
✔ ज़रूरत और दिखावे में फर्क समझो
✔ बीमारी के लिए पहले से तैयारी रखो
✔ “लोग क्या कहेंगे” से ऊपर “मैं कैसे जियूँगा” रखो
यकीन मानिए—
कम चीज़ों में भी
ज़िंदगी बहुत खूबसूरत हो सकती है।
अगर आज नहीं रुके, तो कल बहुत देर हो जाएगी
मैं यह लेख इसलिए लिख रहा हूँ
क्योंकि मैं और किसी दोस्त को खोना नहीं चाहता।
मैं नहीं चाहता कि
किसी और की मौत का कारण
हार्ट अटैक नहीं, कर्ज़ का डर लिखा जाए।
अगर आप कर्ज़ में हैं—
तो अकेले नहीं हैं।
लेकिन चुप रहना सबसे बड़ा अपराध है।
बात कीजिए।
योजना बनाइए।
और सबसे ज़रूरी—
कर्ज़ को ज़िंदगी से बड़ा मत बनने दीजिए।
अंत में बस इतना ही
पैसा कमाना ज़रूरी है,
लेकिन ज़िंदा रहना उससे भी ज़्यादा।
कर्ज़ लेकर बड़ा दिखने से बेहतर है—
कर्ज़ मुक्त होकर चैन से जीना।
क्योंकि
ज़िंदगी दोबारा नहीं मिलती,
लेकिन EMI हर महीने आती है।
लेखक:
श्री. दिनेश मिश्रा
(आर्थिक सल्लागार | समाजसेवी | लेखक | मानवाधिकार एवं महिला-बाल संरक्षण पर कार्यरत)
Right
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