स्वयंसिद्धा: सहारे से स्वावलंबन की ओर एक सशक्त यात्रा
स्वयंसिद्धा केवल एक प्रोजेक्ट नहीं है, यह उन बेटियों के जीवन में एक नई शुरुआत है, जिनका बचपन बालगृह में बीता ,और 18 वर्ष पूरे होते ही समाज की कठोर वास्तविकता के सामने उन्हें अकेले खड़ा होना पड़ता है।
त्रिकाय केयर एंड क्रियेशन असोसिएशन के माध्यम से
स्वयंसिद्धा उसी खालीपन को भरने का एक ईमानदार प्रयास है।
बालगृह से बाहर—लेकिन जीवन के लिए अभी तैयार नहीं
कानून के अनुसार 18 वर्ष पूरे होते ही, बालगृह में रहने वाली लड़कियों को बाहर आना पड़ता है।
काग़ज़ों में वे “बालिग” हो जाती हैं, लेकिन जीवन की दृष्टि से वे अभी भी,
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भावनात्मक रूप से अस्थिर
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सामाजिक रूप से असुरक्षित
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और आर्थिक रूप से असहाय होती हैं
ऐसे समय में समाज अक्सर कह देता है, “अब अपने फैसले खुद लो।”
लेकिन बिना सहारे दिया गया यह कथन, स्वतंत्रता नहीं, उपेक्षा बन जाता है।
स्वयंसिद्धा: एक संक्रमणकालीन सहारा
स्वयंसिद्धा इसी मोड़ पर खड़ी लड़कियों के लिए
एक संक्रमणकाल (Transition Phase) प्रदान करता है।
यहाँ—
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न तो मुफ्तखोरी सिखाई जाती है
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न ही अचानक आत्मनिर्भर बनने का दबाव डाला जाता है
बल्कि—
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जीवन कौशल
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आर्थिक समझ
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निर्णय लेने की क्षमता
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और आत्मसम्मान
इन सबका धीरे-धीरे विकास किया जाता है।
त्रिकाय केयर एंड क्रियेशन असोसिएशन का दृष्टिकोण
त्रिकाय केयर एंड क्रियेशन असोसिएशन का मानना है कि—
सिर्फ सहारा देना पर्याप्त नहीं,
सही दिशा देना ज़रूरी है।
इसी सोच के साथ स्वयंसिद्धा को विकसित करने का प्रयास निरंतर किया जा रहा है।
संस्था यह समझती है कि, इन लड़कियों का भविष्य, सिर्फ आज के खर्चों से नहीं, बल्कि आज की तैयारी से तय होगा।
सहयोग जो इस प्रयास को मजबूत बनाता है
इस यात्रा में कुछ लोगों और समूहों का योगदान
अत्यंत महत्वपूर्ण और अमूल्य है—
🔹 संवेदनशील समाजसेवी
वे लोग, जो सवाल नहीं करते, समझते हैं।
जो शर्तें नहीं रखते, साथ खड़े रहते हैं।
🔹 कॉलेज के विद्यार्थी
युवा मन, युवा सोच और ऊर्जा के साथ जनजागृति, संवाद और सहभागिता के माध्यम से स्वयंसिद्धा को समाज तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
🔹 संस्था के संचालक
शिल्पा बांबरकर और जयेश बांबरकर
जिनका मार्गदर्शन, संचालन और प्रतिबद्धता, इस प्रोजेक्ट को निरंतर दिशा देती है।
उनका सहयोग केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि मानवीय और दूरदर्शी है।
🔹 संस्थापक की भूमिका
त्रिकाय केयर एंड क्रियेशन असोसिएशन के संस्थापक
दिनेश मिश्रा
स्वयं विद्यार्थियों के साथ मिलकर, सोशल मीडिया के माध्यम से, जनजागृति के कार्यक्रम संचालित करते हैं।
इन प्रयासों का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि समाज की सोच को झकझोरना है।
जनजागृति: सोच बदले बिना बदलाव संभव नहीं
स्वयंसिद्धा यह मानता है कि—
समस्या केवल संसाधनों की नहीं,
मानसिकता की भी है।
जब तक समाज—
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मदद को “दान” समझता रहेगा
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और ज़रूरत को “कमज़ोरी”
तब तक स्थायी बदलाव संभव नहीं।
इसीलिए जनजागृति स्वयंसिद्धा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।
आज की तैयारी, कल की सुरक्षा
स्वयंसिद्धा का लक्ष्य इन लड़कियों को किसी पर निर्भर बनाना नहीं,
बल्कि—
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आत्मनिर्भर
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आत्मविश्वासी
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और निर्णयक्षम नागरिक बनाना है।
आज दिया गया सही मार्गदर्शन कल किसी गलत फैसले से उन्हें बचा सकता है।
आशा का आधार
आज भी समाज में ऐसे लोग हैं जो संवेदना से सोचते हैं।
जो मानते हैं कि—
समाज की असली पहचान
उसके सबसे कमजोर सदस्य से होती है।
स्वयंसिद्धा ऐसे ही लोगों की सहभागिता से आगे बढ़ रहा है।
अंत में…
स्वयंसिद्धा
त्रिकाय केयर एंड क्रियेशन असोसिएशन का एक प्रोजेक्ट भर नहीं, बल्कि—
एक सामाजिक ज़िम्मेदारी है।
एक मानवीय संकल्प है।
और एक बेहतर कल की नींव है।
जब समाज, संस्था और संवेदनशील नागरिक एक साथ खड़े होते हैं, तब कोई भी बेटी अकेली नहीं रहती।
लेखक:
श्री. दिनेश मिश्रा
(आर्थिक सल्लागार | समाजसेवी | लेखक | मानवाधिकार एवं महिला-बाल संरक्षण पर कार्यरत)
www.dineshmishra.in

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