अगर पुरुष भी बच्चे पैदा कर सकते…


सुख, जिम्मेदारी और सहमति की एक उलटी दुनिया

कभी-कभी सबसे गहरी सच्चाइयाँ मज़ाक के रूप में सामने आती हैं।

एक दिन मेरे दिमाग में अचानक एक अजीब-सी कल्पना आई…

क्या होता अगर इस दुनिया में सिर्फ महिलाएँ ही नहीं, पुरुष भी गर्भ धारण कर सकते?
और नियम यह होता:

“जिसे पहले परमसुख मिलेगा — वही बच्चा पैदा करेगा।”

बस…
न कोई टेस्ट ट्यूब, न साइंस फिक्शन मशीन…
सिर्फ प्रकृति का नियम बदल गया।

पहली नज़र में यह सुनने में हास्यास्पद लगता है, लेकिन अगर आप 10 मिनट भी इस पर गंभीरता से सोचें — तो आपको महसूस होगा कि यह कल्पना असल में समाज के सबसे बड़े असंतुलन को उजागर कर देती है।

यह कहानी बच्चे पैदा करने की नहीं है।
यह कहानी है — सुख, जिम्मेदारी, शक्ति, सहमति और न्याय की।

1. प्रेम संबंधों का पहला बदलाव — रोमांस से ज्यादा सावधानी

आज की दुनिया में एक रिलेशनशिप में सबसे ज्यादा सतर्क कौन रहता है?

अक्सर लड़की।

क्योंकि उसके दिमाग में एक स्थायी डर रहता है:

  • गर्भ हो गया तो?
  • समाज क्या कहेगा?
  • करियर का क्या होगा?
  • परिवार क्या सोचेगा?

अब इस नियम को उल्टा कर दीजिए।

अब लड़का डेट पर जाने से पहले सोचेगा:

“अगर गलती से पहले सुख मिल गया तो??
मुझे प्रेग्नेंसी हो जाएगी?”

वह इंटरनेट सर्च करेगा:

  • “पहचान कैसे करें कि प्रेग्नेंसी शुरू हुई?”
  • “पुरुषों की शुरुआती गर्भावस्था के लक्षण”
  • “मूड स्विंग क्यों हो रहे हैं?”

और लड़की कहेगी:

“इतना मत सोचो… रिलैक्स रहो… कुछ नहीं होगा।”

दुनिया का पहला बड़ा परिवर्तन यहीं होगा —
रोमांटिक रिश्तों में असली सतर्कता पुरुषों में आ जाएगी।

2. मेडिकल स्टोर का दृश्य

आज मेडिकल स्टोर में कंडोम खरीदते समय कौन ज़्यादा असहज होता है?

पुरुष।

लेकिन इस नई दुनिया में…

सबसे लंबी लाइन किसकी होगी?

पुरुषों की।

एक लड़का धीरे से फार्मासिस्ट से कहेगा:

“भाई… सबसे सुरक्षित वाला देना… एक्स्ट्रा-स्ट्रॉन्ग… डबल नहीं, ट्रिपल प्रोटेक्शन।”

फार्मासिस्ट मुस्कुराकर बोलेगा:

“भाई, अब गर्भ तुम्हें ठहरेगा… सावधानी तो रखनी पड़ेगी।”

आज जो मानसिक तनाव महिलाओं पर रहता है —
“अनचाहा गर्भ” —
वह पहली बार पुरुषों के हिस्से आता।

और अचानक समाज समझता:

गर्भ सिर्फ जैविक घटना नहीं है, यह मानसिक जिम्मेदारी भी है।

3. ऑफिस और करियर की दुनिया

आज भी कई जगहों पर महिलाओं से अनौपचारिक सवाल पूछा जाता है:

“शादी कब कर रही हो?”
“फैमिली प्लानिंग?”

क्यों?

क्योंकि कंपनी सोचती है — maternity leave।

अब कल्पना कीजिए नया इंटरव्यू:

HR:
“Mr. Verma, आपकी शादी हो चुकी है?”

“जी।”

“तो अगले 2-3 साल में आप pregnancy plan कर रहे हैं क्या?”

अब पुरुष को पहली बार समझ आएगा कि कैरियर और जैविक जिम्मेदारी का टकराव क्या होता है।

और शायद तब समाज कहे:

माता-पिता बनना एक व्यक्तिगत निर्णय है, प्रोफेशनल कमजोरी नहीं।

4. जबरदस्ती की परिभाषा

अब इस कल्पना का सबसे गंभीर हिस्सा।

मान लीजिए किसी ने जबरदस्ती संबंध बनाया।
और वही नियम लागू है —
जिसे पहले सुख मिला, वही गर्भ धारण करेगा।

तो क्या होगा?

संभव है —
जबरदस्ती करने वाला व्यक्ति खुद गर्भवती हो जाए।

यह कल्पना असहज है…
लेकिन यह एक नैतिक आईना है।

आज वास्तविक दुनिया में:

  • हिंसा का दर्द एकतरफा है
  • गर्भ का परिणाम भी एकतरफा है

इस कल्पना में प्रकृति कहती है:

“कर्म और परिणाम अलग-अलग लोगों में नहीं बाँटे जा सकते।”

यह सहमति (consent) की सबसे शक्तिशाली शिक्षा है।

5. शादी का सामाजिक दबाव

आज शादी के बाद सबसे सामान्य प्रश्न:

“गुड न्यूज़ कब दे रहे हो?”

नई दुनिया में…

लड़के की माँ कहेगी:

“बेटा, अभी बच्चा मत करना, पहले घर बना लो।”

पिता सलाह देंगे:

“बहुत देर रात बाहर मत रहा कर।”

और दोस्त पूछेंगे:

“सावधान रहना भाई… जिंदगी बदल जाती है।”

अब हम समझेंगे:

समाज महिलाओं को नियंत्रित नहीं करता, समाज गर्भधारण की संभावना को नियंत्रित करता है।

जिसके पास गर्भ की क्षमता होती है —
समाज उसकी स्वतंत्रता सीमित करता है।

6. नैतिकता और परंपरा

इतिहास में “चरित्र” का दबाव मुख्यतः स्त्रियों पर रहा है।

क्यों?

क्योंकि गर्भ दिखाई देता है।

अगर पुरुष गर्भ धारण करते…

तो सदियों से सुने गए वाक्य बदल जाते:

  • “लड़कों को संभालकर रखो”
  • “रात में बाहर मत जाने दो”
  • “दोस्ती सोच-समझकर करो”

और हमें एहसास होता:

नैतिकता अक्सर आदर्शों से नहीं, सामाजिक डर से बनती है।

7. राजनीति और कानून

नई संसद में बहस होती:

  • पितृत्व अवकाश 1 वर्ष
  • प्रेग्नेंट पुरुषों के लिए विशेष सीट
  • सार्वजनिक स्थानों पर विशेष सुविधाएँ

और कानून अचानक बहुत सख्त हो जाते।

क्यों?

क्योंकि अब कानून बनाने वाले भी जोखिम में हैं।

समाज का एक गहरा सत्य है:

जिस पीड़ा को सत्ता अनुभव करती है, उसी के लिए सबसे पहले कानून बनता है।

8. असली सीख — सुख और जिम्मेदारी

यह कल्पना हमें क्या सिखाती है?

मानव समाज में अक्सर एक असंतुलन रहा है:

सुख साझा होता है
परिणाम एकतरफा

और जहाँ परिणाम एकतरफा होता है,
वहाँ शक्ति संतुलन भी एकतरफा हो जाता है।

इसलिए असल समस्या पुरुष या महिला नहीं है।
समस्या है — जिम्मेदारी का असमान वितरण

अगर दोनों को समान परिणाम भुगतना पड़े —
तो व्यवहार अपने-आप बदल जाता है।

9. असली दुनिया में हमें क्या बदलना है

हमें प्रकृति बदलने की जरूरत नहीं है।
हमें सोच बदलने की जरूरत है।

  • संबंध में सहमति बराबर हो
  • निर्णय साझा हो
  • जिम्मेदारी साझा हो
  • पालन-पोषण साझा हो

बच्चा सिर्फ माँ का नहीं होता।
बच्चा सिर्फ पिता का भी नहीं होता।

बच्चा एक रिश्ते की जिम्मेदारी है —
और रिश्ता बराबरी से ही टिकता है।


लेखक:
श्री. दिनेश मिश्रा
(आर्थिक सल्लागार 
समाजसेवी | लेखक | मानवाधिकार एवं महिला-बाल संरक्षण पर कार्यरत)


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